Wednesday, 30 September 2020

Rampur Thirah Kand- उत्तराखंड आंदोलन-रामपुर तिराहा गोलीकांड-DeodarOnline

 रामपुर तिराहा कांड 

रामपुर तिराहा कांड



उत्तराखंड आंदोलन मे 2 अक्टूबर 1994 का दिन काले अक्षरों में लिखा जाता है जब दिल्ली रैली में भाग लेने जा रही उत्तराखंड की  भोली भाली जनता को उत्तरप्रदेश सरकार की दमनकारी नीति का शिकार होना पड़ा। 

    उत्तराखंड आंदोलन में दिसम्बर 1993 में बसपा के समर्थन पर मुलायम सिंह यादव की सरकार बनी और शासकीय सेवाओं में अन्य पिछड़ी जातियों के लियें 27 प्रतिशत आरक्षण लागू कर दिया गया। 17 जून 1994 में शिक्षण संस्थानों में प्रवेश पाने हेतु भी अन्य पिछड़ी जातियों के लिये 27 प्रतिशत आरक्षण व्यवस्था लागू की गयी। उत्तराखण्ड राज्य के पक्ष में तथा 27 प्रतिशत आरक्षण के विरोध में गगन भेदी नारे लगाये गये। 1, 2 अगस्त 1994 को पौड़ी में उत्तराखण्ड राज्य की मांग को लेकर उत्तराखण्ड क्रांति दल के संरक्षक इन्द्रमणि बडौनी अन्य सात लोगों के साथ आमरण अनशन पर बैठे। 7 अगस्त को प्रशासन द्वारा उनकी गिरफ्तारी पर पूरा उत्तराखण्ड आन्दोलन की आँच में झुलस गया।

मुख्यमंत्री मुलायम सिंह यादव ने ‘‘हमारा संकल्प उत्तराखण्ड राज्य, हमारा संकल्प उत्तराखण्ड का बहुमुखी प्रयास’’ शीर्षक से तमाम समाचार पत्रों में विज्ञापन प्राकाशित करवाया जिसमें ‘उत्तराखण्ड मे सेवा व समता की पहल’ का ऐलान करते हुए कहा गया था कि उत्तराखण्ड के लोगों को उत्तरप्रदेश की सेवाओं में 2 प्रतिशत का विशेष आरक्षण की व्यवस्था हेतु केन्द्र को प्रस्ताव प्रेषित किया गया है। उत्तराखण्ड में चलने वाली बसों में छात्रों को 50 प्रतिशत भाड़े में छूट दी जाऐगी। उत्तराखण्ड के तृतीय व चतुर्थ श्रेणी के पदों पर स्थानीय लोगों को छूट दी जाऐगी, हिलकैडर सख्ती से लागू किया जाऐगा।

उत्तराखण्ड की भिन्न भौगोलिक स्थिति के बावजूद जनसंख्या के आधार पर ग्राम सभाओं की परिसमन और मात्र 3 प्रतिशत से कम आरक्षरण लागू करने के सरकारी आदेशों ने पर्वतीय क्षेत्र की जनता को लामबद्ध होकर आन्दोलन करने के लिए विवश कर दिया था। हिल कैडर को सख्ती से लागू करने, ग्राम सभाओं का स्वरूप यथावत रखने व पूरे उत्तराखण्ड को 27 प्रतिशत आरक्षण की परिधि में लेने की मांग को लेकर यूं तो जुलाई 1994 से ही आन्दोलन की शुरूआत हो चुकी थी लेकिन 2 अगस्त को पौड़ी प्रेक्षागृह के बाहर उत्तराखण्ड क्रांति दल ने आमरण अनशन की शुरूआत कर पृथक राज्य आन्दोलन को जो व्यापकता प्रदान की, वह उत्तराखण्ड राज्य आन्दोलन के इतिहास में अगस्त क्रांति साबित हुई।

पहाड़ की जनता के व्यापक हित में मात्र तीन मुद्दों को लेकर 2 अगस्त 1994 को पौड़ी प्रेक्षागृह के बाहर उत्तराखण्ड क्रांति दल के वयोवृद्ध नेता इन्द्रमणि बडौनी, रतनमणी भट्ट, डाॅ0 वासुवानन्द पुरोहित, प्रेम दत्त नौटियाल, पान सिंह रावत, विष्णुदत्त बिन्जोला, बिशन पाल परमार व दौलतराम पोखरियाल आमरण अनशन पर बैठे थे। इसी दिन नगर पालिका हाॅल में सम्पन्न उत्तराखण्ड क्रांति दल की केन्द्रीय कार्यकारिणी की बैठक के निर्णयानुसार गढ़वाल मण्डल में दिवाकर भट्ट व कुमाऊँ मण्डल में आन्दोलन के संचालन का दायित्व पूरन सिंह डंगवाल को सौपा गया। इन दिनों आरक्षण के मुद्दे पर पर्वतीय क्षेत्र के छात्रों ने भी आन्दोलन का बिगुल बजा दिया था। पौड़ी में अनशन शुरू होने के कारण आन्दोलनकारियों को मिल रहे जन समर्थन को देखते हुए, 5 अगस्त को हिमालयन इन्स्टीट्यूट देहरादून के संस्थापक स्वामी राम ने अनेक प्रलोभन देकर आन्दोलनकारियों का अनशन तुड़वाने का असफल प्रयास किया। 6 अगस्त को उत्तराखण्ड क्रांति दल कार्यकर्ताओं द्वारा पूरे शहर में पंक्तिबद्ध होकर जुलूस निकाला गया। इस दिन से सभी कार्यकर्ता अनशन स्थल को इस आशंका से घेरे रहे कि कहीं पुलिस प्रशासन प्रतिकूल स्वास्थ्य वाले अनशनकारियों को जबरन वहां से हटा न लें, क्योंकि एक दिन पूर्व कलक्ट्रेट परिसर की दीवार तोड़ने व उत्तराखण्ड क्रांति दल के रूख को देखकर पुलिस प्रशासन ने अनशन स्थल पर सुरक्षा व्यवस्था कड़ी कर दी थी। दीवार तोड़ने के मामले में पुलिस ने प्रिवेंस ऑफ़ डैमेज टू पब्लिक प्रोपर्टी एक्ट 1984 सैक्शन 3, सी 7 की धारा 427 आई0 पी0 सी0 के अन्तर्गत अज्ञात व्यक्तियों के खिलाफ मामला दर्ज कर दिया गया था। अगस्त को ही जिलाधिकारी के सभाकक्ष में प्रशासनिक अधिकारियों की बैठक में उत्तराखण्ड क्रांति दल के आन्दोलन व अनशनकारियांे के स्वास्थ्य की स्थिति की समीक्षा की गई। प्रशासन ने शान्ति व्यवस्था बनाए रखने के लिये जनपद में इंटर मीडिएट स्तर के शिक्षण संस्थानों को पहले ही 10 अगस्त तक के लिये बन्द कर दिया था। शान्ति व्यवस्था के मद्देनजर ही पूरे जनपद में 2 महीने के लिये धारा 144 लगाकर जुलूस व जनसभाओं पर प्रतिबंध के साथ बिना अनुमति के लाउडस्पीकर के प्रयोग पर भी प्रतिबंध लगा दिया। 


रामपुर तिराहा कांड

    इस सब के बावजूद जब आन्दोलनकारी अनशन से उठने को तैयार नहीं हुए तो 8 अगस्त को पुलिस ने लाठी चार्ज कर श्री बडौनी सहित सभी आमरण अनशनकारियों को जबरन उठा लिया।

1 सितम्बर 1994 को खटीमा में पुलिस की बर्बरता के कारण एक खौफनाक हादसा हुआ। पुलिस ने पृथक राज्य की मांग व आरक्षण नीति का शांतिपूर्वक विरोध करने वाले आन्दोलनकारियों पर ताबड़तोड़ फायरिंग शुरू कर दी, जिसमें सात लोग मारे गये और कई घायल हुए। 2 सितम्बर को मंसूरी में पुलिस ने आन्दोलनकारियों पर गोलियाँ चलायी, जिसमें 8 लोग मारे गये। इनमें दो महिलाऐं हंसा धनाई व बेलमती चैहान गोली की शिकार हुई। इसी दिन पौड़ी में विशाल रैली का आयोजन हुआ। 2 अक्टूबर 1994 में संयुक्त संघर्ष समिति द्वारा आयोजित रैली में भाग लेने जा रहे आन्दोलनकारियों पर मुजफ्फरनगर मे गोलियां चलाई गई व कई महिलाओं के साथ अभद्रता की गई। जो आज खटिमा, मंसूरी और मुजफ्फरनगर की घटनाऐं मानव इतिहास में एक कलंक बनकर रह गई।

पृथक राज्य आन्दोलन में उत्पन्न हिंसा के दौरान खटीमा व मंसूरी में पुलिस के हाथों कई आन्दोलनकारियों के मारे जाने के बाद भी केन्द्र सरकार का मौन न टूटने पर उत्तराखण्ड संयुक्त संघर्ष समिति ने दिल्ली जाकर ही सरकार के द्वार पर दस्तक देने के लिए संसद कूच की घोषणा की थी। अपने निर्णय को अंजाम तक पहुंचाने के लिए आंदोलनकारियों ने सितम्बर से ही बड़े पैमाने पर तैयारियाँ शुरू कर दी थी। 2 अक्टूबर 1994 को होने वाली रैली के लिए दिल्ली सरकार से स्वीकृति लेने और स्थान के चयन का दायित्व दिल्ली की उत्तराखण्ड आन्दोलन संचालन समिति और उत्तराखण्ड क्रांति दल के कुछ वरिष्ठ नेताओं को सौंपा गया जिन्हें रैली की अनुमति प्राप्त करने में भारी कठिनाइयों का सामना करना पड़ा।

रैली के आयोजन की तैयारियाँ दिल्ली में जोर-शोर से चल रही थी। 1 अक्टूबर 1994 को दिन ही में कुमाऊँ क्षेत्र के लोगों का दिल्ली पहुंचना शुरू हो गया था। 1 अक्टूबर की रात गढ़वाल मण्डल के आन्दोलनकारियों की बसे जो दिल्ली रैली में हिस्सा लेने जा रही थी। मुजफ्फरनगर के रामपुर चैराहे पर रोक ली गयी तथा उत्तरप्रदेश पुलिस द्वारा उन आन्दोलनकारियों पर अमानवीय अत्याचार किये गये तथा महिलाओं के साथ दुराचार किया गया। इस घटना में उत्तराखण्ड के कई आन्दोलनकारी मारे गये तथा कई घायल हो गये।

पुलिस द्वारा आन्दोलनकारी महिलाओं पर लाठीचार्ज किया गया तथा महिलाओं के साथ दुराचार भी किया गया। पुलिस अत्याचार तथा फायरिंग में 8 लोगों की मृत्यु हो गयी। उत्तर प्रदेश सरकार के इशारे में हुई इस घटना की समस्त विश्व व भारत में निन्दा हुई। मामला मानवाधिकार व महिला आयोग तक पहुंचा तो उत्तर प्रदेश सरकार द्वारा किसी भी प्रकार के अत्याचार की घटना से इन्कार कर दिया गया। मुजफ्फर नगर काण्ड के विरोध में अगले दिन पूरे उत्तराखण्ड में उग्र प्रदर्शन हुए।

कुंवर सिंह खत्री इस काण्ड के विषय में बताते हैं-
1 अक्टूबर 1994 को हमारी बस सवेरे नागनाथ पोखरी (चमोली) से दिल्ली रैली के लिये निकली। रास्ते में विभिन्न अवरोधों को पार करते हुए हम रात 11 बजे सिसौना रामपुर तिराहे पर पहुंचे हमें पता नहीं था कि हमसे पहले वहां कितना नरसंहार हुआ है? हमने देखा कि हमारे गाड़ी के आगे से कई गाड़ियां रास्ता जाम किये हुए थी, कुछ शोरगुल भी सुनायी दे रहा था। इतने में कर्मचारी संगठन के अध्यक्ष एस0एस0 बत्र्वाल हाथ में डण्डा लिये हमारी गाड़ी के सामने यह कहते-कहते आये कि हमारे आदमी पिट गये हैं और आप लोग बैठे हैं। इतने में हमारी गाड़ी के कई लोगों के साथ, मै भी गाड़ी से उतरा और आगे जाकर देखा कि चमोली जिले के ही हमारे साथी कर्मचारी संयुक्त संघर्ष समिति गाड़ी नं0-यू0पी0-6160 से आये थे। जिसमें महिलायें भी थी। उनके सिर पर पट्टी बांधी जा रही थी, वह बुरी तरह कराह रहे थे। चारों ओर शोर हो रहा था लोगों के समझ में नहीं आ रहा था कि क्या करें? पुलिस कर्मी हाथों में डंडे लिए हुए थे, कुछ सिपाही लाठियों से बुरी तरह से आन्दोलनकरियों को पीट रहे थे। इतना ही नही वे गन्दी-गन्दी गालियांे का भी प्रयोग कर रहे थे। जिसे सुनकर ही शर्म आ रही थी। कुछ समय पश्चात् मै जब अपनी गाड़ी मे लौटा तो तुरन्त बाद पुलिस वालों ने बाहर से ईटों व डण्डों से हमारी गाड़ियों पर मारना शुरू कर दिया। देखते-देखते सड़क पर काँच का ढेर लग गया और कहने लगे ‘‘आओ किसे चाहिए उत्तराखण्ड? हम देते हैं तुम्हें उत्तराखण्ड।’’ यह सब देखकर ड्राइवर ने गाड़ी निकालने का काफी प्रयास किया पर आगे पीछे से सारा रास्ता जाम हो चुका था। गाड़ी की लाइट भी पुलिसवालों ने तोड़ डाली थी। तत्पश्चात् गाड़ी में सवार लोगों ने अपनी सीटों के नीचे अपने सिर छिपा लिये थे। उस वख़्त हम अपने ईष्ट देवताओं को याद कर रहे थे और सोच रहे थे कि अच्छा हुआ हमने महिलाओं को कर्मचारी संगठन की बस में बैठा दिया। जिसमें मुख्यरूप से शकुन्तला कनवासी, बिमला चैहान सक्रिय थी। न जाने वे किस हाल में होंगी? क्योंकि सड़क पर बराबर मारपीट, शोर मच रहा था। लोग इधर उधर दौड़ रहे थे। क्षण-भर के लिए सिसौना रामपुर तिराहे पर खाकी वर्दीधारियों का एक छत्र राज हो चुका था। हमारी गाड़ी के 18 शीशे टूट चुके थे। र्मात व जिन्दगी से झूलते हुए आन्दोलनकारी यह नहीं समझ पाये कि यह क्या हो रहा है और इसे कौन करवा रहा है व क्यों करवा रहा है, इसको रोकने के लिये किसके पास जायें? कौन इनको रोकेगा?

मुजफ्फर नगर काण्ड ने उत्तराखण्ड आन्दोलन में सभी वर्गों सभी राजनीतिक पार्टियों को एक छत के नीचे लाकर खड़ा कर दिया। अब सब जन की एक ही मांग थी, अलग उत्तराखण्ड राज्य।


शहीद स्मारक


मुजफ्फरनगर काण्ड घटित होने के बाद वहीं के रामपुर गांव के निवासी पं0 महावीर शर्मा द्वारा घटना स्थल पर ही आन्दोलन के शहीदों की स्मृति में शहीद स्मारक बनाने हेतु खसरा नं0 915 में 816 वर्ग गज भूमि उत्तराखण्ड क्रांति दल (डी) को हस्तगत करायी गयी। जिस पर अक्टूबर 1995 में भव्य शहीद स्मारक बनाया गया। आज भी प्रत्येक वर्ष इस घटना की याद में उत्तराखंड में सामाजिक संगठनों व दलों द्वारा रैलीया निकाली जाती है तथा इस घटना को काले दिन के रूप मे याद किया जाता है।  



--डॉ हिमानी ऐरी  के शोध से  साभार 



















Sunday, 6 September 2020

उत्तराखण्ड आंदोलन की पृष्ठ्भूमि-उत्तराखण्ड राज्य की माँग के विभिन्न चरण-उत्तराखण्ड राज्य आन्दोलन-DeodarOnline





उत्तराखण्ड आंदोलन की पृष्ठ्भूमि  


    उत्तराखण्ड की मांग भी स्वतंत्रता संग्राम के साथ-साथ चलती रही। स्वतंत्रता संग्राम के दौरान देश को आजाद कराने के अलावा उत्तराखण्ड का जनमानस ब्रिटिश साम्राज्य से उत्तराखण्ड की भौगोलिक विभिन्नताओं के कारण अलग राज्य बनाने का निरन्तर प्रयास कर रहे थे। यहां की भौगोलिक परिस्थितियां हमेशा से अलग रही हैं। इस बात को यहां के जनमानस ने बहुत पहले ही समझ लिया था। प्राचीन समय से ही यहां की जनता का सामाजिक व्यवहार, संस्कृति, खान-पान भाभर के लोगों से अलग रहा है। राजवंशो के राज्य में भी भाभर का बहुत ही कम क्षेत्र रहा है। कत्यूरी से गोरखा तक पहाड़ का शासन पहाड़ से ही संचालित होता रहा था। अंग्रेजों के आगमन के बाद पहाड़ को संयुक्त प्रांत के अन्तर्गत रख दिया गया उसके उपरान्त पहाड़ का शासन भाभर से संचालित हुआ, और शुरू हुआ पहाड़ की उपेक्षा का दोैर जिसने पहाड़ की जनता को अलग राज्य बनाने के लिए प्रेरित व उद्वेलित किया। 

व्यापक दृष्टिकोण से देखा जाए तो आजादी से पूर्व व आजादी के कई दशकों बाद भी उत्तराखण्ड की जनता की घोर उपेक्षा हुई। उसका भरभूर शोषण ही नही हुआ बल्कि उसे सामाजिक, सांस्कृतिक, नैतिक, चारित्रिक एवं राजनीतिक स्वर पर भी बिल्कुल पंगु बनाया गया। भारत की आजादी के बाद अंग्रेज तो अपने देश लौट गये लेकिन पश्चिम की उस परम्परा को ऐसे शासकों के हवाले कर गए जिस व्यवस्था में एक बाड़े में बन्द हजारों भेड़ों को एक अश्वारोही ग्वाला मनचाही दिशा मे हांक ले जाता है। उत्तराखण्ड के लोगों को भी ठीक इसी तरह हांकने का प्रयास हुआ। अंग्रेजों के अत्याचारों घायल पर्वतीय लोगों को अपने देश की सत्ता से भी जब घावों का मरहम नहीं मिल पाया तो वे दर्द व टीस से छटपटा उठे।

Uttarakhand Andolan
Naveen Samachar

उत्तराखण्ड आन्दोलन मुख्य रूप से तीन चरणों में सम्पन्न हुआ। प्रथम चरण में स्वतंत्रता से पूर्व राज्य की मांग है। प्रारम्भ में जब उत्तराखण्ड अंग्रेजी हुकुमत के अधीन था। हालांकि इस समय देश की स्वतंत्रता प्रमुख लक्ष्य थी, परन्तु इसी के साथ उत्तराखण्ड का एक वर्ग अलग उत्तराखण्ड की मांग को भी स्वतंत्रता आन्दोलन के साथ-साथ जारी रखा हुआ था। 

    1947 में देश की आजादी के बाद 1947 से 1979 उत्तराखण्ड क्रांति दल के निर्माण के समय तक द्वितीय चरण में उत्तराखण्ड आन्दोलन चला। इस चरण में उत्तराखण्ड आन्दोलन सरकारी उपेक्षा के कारण कुछ मंद सा पड़ गया। राजनीतिक पार्टियां अपने निजी स्वार्थों व हितों के लिये उत्तराखण्ड को अलग करने के पक्ष में नही थी। भाजपा ने तो अपने घोषणा पत्र में भी उत्तराखण्ड को समर्थन न देने व अपने सिद्धान्तों के विपरीत होने की बात तक कह दी थी। हालांकि विभिन्न बुद्धिजीवी, छोटे संगठन, पत्र-पत्रिकाऐं अपने स्तर पर उत्तराखण्ड आन्दोलन को जीवित रखे हुए थे तथा जन चेतना का कार्य कर रहे थे।

1979 में मंसूरी मे उत्तराखण्ड क्रांति दल की स्थापना के बाद उत्तराखण्ड राज्य आन्दोलन का तीसरा चरण माना जाता है। उत्तराखण्ड क्रांति दल की स्थापना के बाद उत्तराखण्ड राज्य आन्दोलन मे एक नयी जान आ गयी। पार्टी के निर्माण के बाद चले जन आन्दोलन बड़े उग्र व उग्रत्तर होते चले गये तथा सन् 2000 में इन आन्दोलनों के चलते उत्तराखण्ड एक अलग राज्य के रूप में परिणित हो गया।





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Friday, 21 February 2020

उत्तराखंड का इतिहास - कथा कलविष्ट - गोलू ग़ैराड मंदिर - History of Uttarakhand - Kalvist - GoluGairad temple - DeodarOnline

कलविष्ट

लगभग 200 वर्ष पूर्व कल्लू कोट्यूड़ी नाम का एक राजपूत पाटिया गांव के पास के गांव कोट्यूड़ा कोट में रहता था। उसके पिता का नाम केशव कोट्यूड़ी था। उसकी माता का नाम दुर्पाता (द्रोपादी) था। दुर्पाता के पिता का नाम रामाहरड़ था। 



कल्लू कोट्यूड़ी बहुत ही वीर व साहसी पुरूष था। वह किसानी का काम भी किया करता था परन्तु राजपूत होने के कारण वो ग्वाले का काम भी करता था। कलविष्ट अपनी गायों को चराने के लिए बिनसर के घने जंगलों में जाता था। कहा यह भी जाता है वह गायों को चराने के लिए कठधारा के जंगलों में तथा नहाने के लिए ब्रह्मा घाट (कोशी) में जाता था।

कल्लू कोट्यूड़ी के पास निम्न सामान होना बताया जाता है- मुरली, बांसुरी, मोचंगण् पखाई, रमटा, घुंघरवालों दातुलो, रतना, कामली, झपुवा, कुत्ते, बिल्ली, लखमा, खनुवा लाखो, रूमेली, घुमेली, गाय, भगुवा, रांगो (भैसा), नागुली, भागुली, भैंसी, सुनहरी दातुलो, सै लणी सै, बाखुड़ी भैस। कोई-कोई कल्लू कोट्यूड़ी के पास 12 बागुड़ भैसें तथा 12 भैसें जतिये होना बताते है।

ग्वाला होने के कारण कल्लू कोट्यूड़ी के पास दूध-दही की कोई कमी नही थी। वो बिनसर के सिद्ध गोपाली के वहां दूध पहुँचाया करता था। गांव के ही थोकदार श्री कृष्ण पाण्डे जी के वहां कल्लू कोट्यूड़ी का आना जाना था श्री कृष्ण पाण्डे जी कलविष्ट के अच्छे मित्र हुआ करते थे। कल्लू कोट्यूड़ी को मुरली बजाने का शौक था जिससे वो अपने गायों व भैसों के रेवड़ को हांकता था। कल्लू कोट्यूड़ी के मित्र श्री कृष्ण पांडेय जी की नौलखिया पाण्डे से लड़ाई थी दोनों एक दूसरे को नुकसान पहुंचाने के लिए आतुर रहते थे। एक बार नौलखिया पाण्डेजी श्री कृष्ण पाण्डेजी को नुकसान पहुँचाने के लिए ’’भराड़ी’’ नामक एक भूत को देश से लाए परन्तु कल्लू कोट्यूड़ी एक साहसी व वीर पुरूष था, भूतों को भगाने मे भी उसे महारथ हासिल थी। श्रीकृष्ण पाण्डेजी के ऊपर विपत्ति आती देख कल्लू कोट्यूड़ी ने भराड़ी भूत को हरा त्यूनीगाड़ में एक पत्थर के नीचे दबा दिया। बाद में भराड़ी के प्रार्थना करने पर कल्लू कोट्यूड़ी ने उसे छोड़ दिया।

अपनी किसी भी योजना को सफल न होता देख नौलखिया पाण्डेजी ने कल्लू कोट्यूड़ी तथा श्री कृष्ण पाण्डेजी के बीच मनमुटाव करने की सोची तथा पूरे गांव में ये खबर फैला दी कि श्री कृष्ण पाण्डेजी की स्त्री और कल्लू कोट्यूड़ी गुप्त रूप से श्री कृष्ण के पीठ पीछे मिलते हैं। श्री कृष्ण पाण्डेजी जानते थे कि ये सब बातें झूठी हैं पर लोक लाज से बचने के लिए उन्होनें कल्लू कोट्यूड़ी को मारने की सोची। हालांकि कई लोग मानते हैं कि श्रीकृष्ण पाण्डेजी की स्त्री कल्लू कोट्यूड़ी के रूप रंग और साहस पर मोहित हो गयी थी। इसलिए पांडे जी ने कलविष्ट को मारने की सोची।

श्री कृष्णा पाण्डे जी राजा के पुरोहित थे तो उन्होने राजा से कल्लू कोट्यूड़ी को सजा दने की विनती की और उसे मार देने को कहा। राजा ने चारों ओर पत्र भेजे कि कौन कल्लू कोट्यूड़ी को मारने का बीड़ा उठाता है। लेकिन कल्लू कोट्यूड़ी की वीरता चारों तरफ प्रसिद्ध थी इसलिए ऐसा करने को कोई भी राजी न हुआ अंत मे जयसिंह टम्टा ने ये बीड़ा उठाया।


एक दिन राजा ने कल्लू कोट्यूड़ी को अपने दरबार में आमन्त्रित किया। उस दिन श्राद्ध था राजा ने कल्लू कोट्यूड़ी से दूध-दही लाने को कहा। कल्लू कोट्यूड़ी इतना दूध-दही लेकर के गया कि राजा चकित हो गया। कल्लू कोट्यूड़ी के माथे पर त्रिशूल व पैरों में पद्म के फूल का निशान था। राजा उसका रूप देख कर चकित हो गया तथा उसे न मारने की बात कही। कल्लू कोट्यूड़ी ने राजा के दरबार में कई तरह के करतब भी दिखाए जिससे राजा बहुत प्रसन्न हुआ।

राजा ने एक दिन कल्लू कोट्यूड़ी तथा जयसिंह टम्टा के बीच कुश्ती करवाई यह शर्त के साथ कि जो हारेगा उसकी नाक काटी जाऐगी। कल्लू कोट्यूड़ी की वीरता के सामने जयसिंह टम्टा टिक नहीं पाया तथा उसकी नाक काटी गयी। राजा के दरबार में कल्लू कोट्यूड़ी की धाक बन गई। कल्लू कोट्यूड़ी की इस सफलता से कई लोग जलने लगे। उन्होने उसे मारने के लिए षड्यंत्र किया।

दयाराम पछाई जो पाली पछाऊ का रहने वाला था उसने षड्यंत्र के तहत कल्लू कोट्यूड़ी से कहा कि वो अपने भैसों को लेकर चैरासी माल (तराई-भावर) जाए तो उसे अपने जानवरों के लिए अच्छे चराहागाह उपलब्ध हो सकते हैं। दयाराम पछाई ने सोचा कि अगर कल्लू कोट्यूड़ी तराई-भावर चला गया तो या उसे मुगल सेना मार देगी या वो चैरासी के जंगली जानवरों द्वारा मार दिया जाएगा और उसका षड्यंत्र कामयाब होगा। कल्लू कोट्यूड़ी ने नथुवाखान, रामगाड़, भीमताल होकर भावर में प्रवेश किया। वहां यह खबर फैल गयी कि एक वीर पुरूष अपने जानवरों के साथ् पहाड़ से भावर में पहुँचा है। वहां उसे 1600 मुगल सेना मिली जिसके नेता सूरम खान व भागू पठान थे। कल्लू कोट्यूड़ी को मारने के लिए गजुवा ढिंगो तथा भाम कूर्मी भी मुगल से मिल गए।

कल्लू कोट्यूड़ी की ताकत को आजमाने के लिए उन्होनें कल्लू कोट्यूड़ी से एक भारी लकड़ी की बल्ली को उठाने के लिए बोला जिसे कल्लू कोट्यूड़ी ने आसानी से उठा दिया। जिससे वो लोग घबरा गये कहीं कल्लू कोट्यूड़ी उन्हें मार न डाले। कल्लू कोट्यूड़ी को मारने के लिए उन्होनें मेले का आयोजन किया, परन्तु कल्लू कोट्यूड़ी के जानवरों ने कल्लू कोट्यूड़ी को इस षड्यंत्र की सूचना दे दी। मेले मे कल्लू कोट्यूड़ी ने कहा कि वो पहाड़ी नाच दिखाऐगा नाचते-नाचते कल्लू कोट्यूड़ी ने उस लकड़ी की बल्ली से उन सबको मार दिया।

फोटो साभार - euttaranchal.com

उसके बाद कल्लू कोट्यूड़ी अपने जानवरों को चराने के लिए चैरासी के जंगल को चले गया। वहां उसने देखा कि सारा जंगल शेरों से भरा पड़ा है। कल्लू कोट्यूड़ी ने उस जंगल के सभी शेरों को एक-एक करके मार दिया। जंगल के सबसे बड़े शेर को कल्लू कोट्यूड़ी के खनुवा लाखे (बड़े आकार का बकरा) ने मार दिया।

चैरासी से चलकर कल्लू कोट्यूड़ी अपने खिलाफ रचे षड्यंत्र का बदला लेने दयाराम पछाई के वहां पाली पछाऊ गये। वहां कल्लू कोट्यूड़ी को देख दयाराम डर गया तथा अनजान बनते हुए कल्लू कोट्यूड़ी से पूछा चैरासी कैसा था। कल्लू कोट्यूड़ी ने उत्तर दिया चैरासी तो अच्छी है पर वहां शेर बहुत हैं। कल्लू कोट्यूड़ी को जीवित देख दयाराम को शक हुआ तो उसने पता लगवाया और उसे पता चला कि चैरासी के सारे शेर मारे जा चुके हैं।
कल्लू कोट्यूड़ी ने दयाराम पछाई को अपने खिलाफ षड्यंत्र करने के लिए श्राप दिया कि अगर उसे अब छल से मारा गया तो वो भूत बनकर पालीपछाऊ के लोगों को परेशान करेगा और है भी ऐसा ही इस समय कल्लू कोट्यूड़ी की पूजा पालीपछाऊ मे ही ज्यादा होती है।

अनेक जतन करने के बाद भी जब कल्लू कोट्यूड़ी को मारा न जा सका तो श्री कृष्ण पाण्डे जी ने लखड्योड़ी नाम के उसके साढूभाइे जेा श्री कृष्ण के वहां मुंशी था को भड़काया कि वो किसी तरह से कल्लू कोट्यूड़ी को मारे। लखड्योड़ी ने कल्लू कोट्यूड़ी की भैसों के पैरों मे कील ठोक दी फिर लखड्योड़ी कल्लू कोट्यूड़ी से मिलने गया कलविष्ट ने उसके आने का कारण पूछा तो लखड्योड़ी ने कहा कि,’’वो कल्लू कोट्यूड़ी से भैसें लेने आया है। कल्लू कोट्यूड़ी ने उससे कहा, ’’वो जितनी भैसें चाहता है ले जा सकता है। लखड्योड़ी ने पहले से ही भैसों के पैरों में कीलें ठोक दी थी। उसने कल्लू कोट्यूड़ी से कहा तुम्हारी भैसों के पैरों में तो कीलें ठूकी हुई है।

कल्लू कोट्यूड़ी ने मुंह से भैसों के पैर से कील निकालने की कोशिश की उसी समय लखड्योड़ी ने कल्लू कोट्यूड़ी के पैर काट दिये व कल्लू कोट्यूड़ी को मार डाला। कल्लू कोट्यूड़ी ने मरते-मरते उसे श्राप दिया कि उसने उसे छल से मारा है। इसलिए लखड्योड़ी के खानदान में कोई जीवित नही बचेगा।

कल्लू कोट्यूड़ी मरकर कलविष्ट नाम का ग्राम देवता बन गया। सबसे पहले वो श्रीकृष्ण पाण्डे जी के लड़के को लगा। जब जागर लगायी गई तो पता चला वे कलविष्ट है। कलविष्ट ने कहा कि उसका मन्दिर बनाके उसकी पूजा की जाए वरना वो उनको सताऐगा।


ये घटना कपड़खान में हुई और वहीं पहला मन्दिर बनाया गया जो गोलू गैराड़ के नाम से प्रसिद्ध है। बिनसर के लोग आज भी बोलते है कि कलविष्ट की मुरली की मघुर तान तथा कलविष्ट के भैसों को बुलाने की आवाज गाँव वालों को अकसर सुनाई पड़ जाती है। कपड़खान के लोग अपने जानवरों की रक्षा के लिए कलविष्ट से अभी भी प्रर्थना करते हैं, और सताए हुए लोग कलविष्ट से न्याय मांगते हैं।






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Wednesday, 12 February 2020

उत्तराखण्ड का इतिहास - बैजनाथ मंदिर - कत्युर घाटी - History of Uttarakhand - KatyurGhati - BaijnathTemple - DeodarOnline

उत्तराखण्ड का इतिहास

उत्तराखण्ड का इतिहास सैकड़ों वर्ष पुराना रहा है। वेदों से लेकर उपनिषदों पुराणों, महाभारत व वाल्मीकी की रामायण में भी उत्तराखण्ड का उल्लेख होता रहा है। सभी देवी-देवताओं का वास यहाँ रहा है। उत्तराखण्ड के इतिहास सम्बन्धित जानकारी हम आपको आगे भी देते रहेंगे। इस कड़ी में आज हम बात कर रहे है कत्यूर घाटी व बैजनाथ मन्दिर के बारे में।

कत्यूर घाटी -

कत्यूरी राजाओं ने अपनी राजधानी जोशीमठ से स्थानान्तरित करके अल्मोड़ा से 73 किमी0 दूर वर्तमान गरूड़ के आस-पास बसायी जो कत्यूर घाटी के रूप में प्रसिद्ध हैं। इस घाटी की सरहदें पूर्व में सरयू, पश्चिम में बारामण्डल दक्षिण में दानपुर तथा उत्तर में गढ़वाल बातायी जाती है। इस घाटी में जगथाण का धुरा तथा गोपालकोट की पहाड़ियाँ हैं। नदियों में गोमती तथा गरूड़गंगा बहती हैं।
यह घाटी तराई-भाबर की तरह समतल है जिससे यहाँ खेती आदि करने में सुविधा होती है। जिस वजह से यहाँ बसायत हुई होगी नदी घाटी होने के कारण यहाँ तराई-भाबर की तरह ही उमस का वातावरण रहता है। जिससे यहाँ मच्छरों से होने वाली बीमारी मलेरिया का प्रकोप रहता था। वर्तमान में स्वास्थ्य सुविधाओं में सुधार होने के कारण इस बीमारी में गिरावट आ गयी है पर खतरा लगातार बना रहता है।
History of Uttarakhand

कत्यूर राजाओं ने अपनी राजधानी की सुरक्षा के लिए दो किलों का निर्माण किया। गोपालकोट तथा रणचुला। ऐसा माना जाता है कि गोपालकोट में कत्यूरी राजाओं का खजाना रहता था। बाद में कत्यूरी वंश का अवसान हो जाने के बाद चंद राजाओं के समय में इस किले में सेना की टुकड़ी रहने लगी। वर्तमान में गोपालकोट का किला पूरी तरह से नष्ट हो चुका है और अवशेष मात्र भी सुरक्षित नहीं है।
रणचुला किले के अवशेष आज भी विद्यमान हैं। यह किला कत्यूर शहर के ऊपर है तथा यहाँ से शहर का नजारा खूबसूरत नजर आता है। पहले इस नगर का नाम कार्तिकेयपुर या कबीरपुर माना जाता है बाद मे अपभ्रंश के कारण ये कत्यूर हो गया। ऐसा भी माना जाता है इस घाटी में जहाँ लोग अब खेती करते हैं पहले यहाँ पर 4 से 5 मील की झील भी हुआ करती थी। जो बाद में टूट गयी या सूख गयी और कत्यूरी लोगों की बसायत हुई।
इस प्राचीन नगर के पूर्व की तरफ गोमती के किनारे बैजनाथ नामक एक शिव मंदिर भी है जो अपनी विशेष गौथिक शैली के लिए प्रसिद्ध है। इस मन्दिर के विषय में एक क्विदंती भी है कि इस मंदिर का वास्तुकार यह चाहता था कि इस मन्दिर से बागेश्वर के शिव मन्दिर बागनाथ का शिखर भी दिखाई दे परन्तु कत्यूरी राजा द्वारा ऐसा करने से मना कर दिया गया।

बैजनाथ मन्दिर -

कत्यूरी राजाओं के शासन की विशेषताओं में से एक उनका मन्दिर बनाना भी है। अपनी इसी विशेषता के चलते ही कत्यूरी राजाओं ने अनेक मन्दिरों का निर्माण कराया। इन्हीं मन्दिरों से बैजनाथ या वैद्यनाथ का प्राचीन शिव मन्दिर भी है। जो अपने मन्दिर समूूहों तथा अनोखी गौथिक वास्तुकला के लिए प्रस्द्धि है।
बैजनाथ मन्दिर का प्रमुख मन्दिर भगवान शिव को समर्पित है तथा 17 अन्य छोटे मन्दिर अलग-अलग देवी देवताओं को समर्पित हैं। जिसमें कोटेश्वर देव, लक्ष्मीनारायण तथा ब्राह्मणी देवी के मन्दिर प्रमुख रूप से प्रसिद्ध हैं। मुख्य मन्दिर का शिला विन्यास पंचरथ है और आगे की तरफ एक मण्डप बना हुआ है। गौथिक शैली वास्तुकला की विशेषता उनके नाग शिखर होते हैं पर बैजनाथ के मुख्य मन्दिर का शिखर होते हैं पर बैजनाथ के मुख्य का शिखर पूर्व में मौसमी आपदा से नष्ट हो चुका है। वास्तुकला व कार्बन डेटिंग से इन मन्दिरों का निर्माण लगभग 9वीं से 12वीं शताब्दी तक के कत्यूरी राजाओं द्वारा किया गया प्राप्त हुआ है।
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मूर्ति कला-

कुमाऊँ में प्राप्त 9वीं या उसके बाद की प्राप्त मूर्तियां जितनी अच्छी अवस्था में यहाँ प्राप्त होती हैं वो अन्यत्र कहीं प्राप्त नहीं होती हैं सिस्ट के पत्थर से बनी शिव, पार्वती व अन्य देवी-देवताओं की मूर्तियाँ हैं। कुल मिलाकर यहाँ 26 से 30 मूर्तियों का होना कहा जाता है।
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 मन्दिर परिसर में चोरों द्वारा कई मूर्तियों को चोरी कर देश के बाहर बेच दिया गया। कुछ मूर्तियों को भारत सरकार की मदद से यहाँ वापस लाया गया है तथा किमती मूर्तियों को सुरक्षा के लिहाज से आम आदमी की पहुँच से दूर रखा गया है। भविष्य में म्यूजियम बन जाने के बाद शायद आमजन के लिए खोल दिया जाए।
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भीम पत्थर- 

मन्दिर परिसर मे भीम पत्थर भी है। इसके विषय में ऐसी क्विदन्ती है कि इस शिला से महाभारत के पाण्डव भीम खेला करते थे। ऐसा माना जाता है कि 9 लोग अगर अपनी एक-एक ऊँगली से इसे ऊठाने की कोशिश करें तो यह आसानी से उठ जाता है, अन्यथा नही उठता।
मन्दिर कुंड- मन्दिर के आगे एक विशाल जल कुंड है त्योहारों के समय भक्तगण इस मन्दिर कुंड में नहाकर अपने को पवित्र मानते हैं। यह कुंड हरिद्वार के ब्रह्मकुंड की तरह ही है। इस कुंड में कई तरह की मछलियां भी देखने को मिलती हैं।
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सन्दर्भ - उत्तरखंड का इतिहास (बद्री दत्त पांडेय )



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