Sunday, 22 August 2021

One Winter Evening : DeodarOnline


 I was tired of rising up in tears, 

I can’t put to bed, these fears. 

New to this grief, unexplained, 

Not a stranger to heartache and pain. 

Fire inside me is burning me alive, 

I fathom to let it burn than to leave and let it die. 

Am I a silhouette, asking every now and then, 

Will it be over? Will I ever feel better again?

A silhouette, hunting lost treasures on my own, 

The more I try, the more I'm alone.

So, I watch the winter sun to lead me home,

So sick of the past, trapped in my scone.

Friday, 5 March 2021

THE RECLUSE MARINER : DEODARONLINE

 

SAILING AT NAINITAL

 

WITH THE HAUL OF BREEZE, 

I STAND,

 UN-FREQUENTED.

WITH THE MAST, RISING AND FALLING.

WARM SUN AROUND ME, 

WILD WATER UNDER ME,

SCREAMING, CALLING AND ASKING.

WHY DO I LOOK FOR A PLACE TO REST?

WHEN I MIGHT SAIL TO A CALMER HEAVEN,

OR, SAIL PAST THE WOODS THROUGH AVON.

GAZING THROUGH THE SKY OF STARS,

INTO THE PERIL OF EMPTINESS. 

FEELING THE THRILL OF PASSING AIR,

ON THE PATH OF PIOUSNESS. 

~ Manas Pathak

 IG - @_manaspathak_

 

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Saturday, 19 September 2020

Gulzar-Sab Kuch Waise Hi Chalta Hai-Gulzar Nazm-Gulzar Poem

 सब कुछ वैसे ही चलता है 


सब कुछ वैसे ही चलता है 

जैसे चलता था जब तुम थी,

रात भी वैसे ही, सर मूंदे आती है 

दिन भी वैसे ही आँखे मलता जागता है 

तारे सारी रात जम्हाइयाँ लेते हैं 

सब कुछ वैसे ही चलता है 

जैसे चलता था जब तुम थी।  




Sab Kuch Waise hi Chalta Hai
Photo-the Conversation.com


काश तुम्हारे जाने पर 

कुछ फर्क तो पड़ता जीने में 

प्यास न लगती पानी की 

बाल हवा में न उड़ते 

या धुंआ निकलता सांसो से। 

सब कुछ वैसे ही चलता है 

Friday, 4 September 2020

Amrita Pritam -Hindi Kavita-Pahchan-Mera_Pata-Rozi-Best of Amrita Pritam

 
Photo-theseer

पहचान 

तुम मिले 
तो कई जन्म 
मेरी नब्ज़ में धड़के 
तो मेरी सांसों ने तुम्हारी सांसों का घूंट पिया 
तब मस्तक में कई काल पलट गए---

एक गुफ़ा हुआ करती थी 
जहाँ मैं थी और एक योगी 
योगी ने जब बाजुओं लेकर 
मेरी सांसों को छुआ 
तब अल्लाह कसम!
यही महक थी जो उसके होंटो से आई थी---
यह कैसी माया कैसी लीला
कि शायद तुम ही कभी वह योगी थे 
या वही योगी है--
जो तुम्हारी सूरत में मेरे पास आया है 
और वही मैं हूँ ---- और वही महक है ---



अमृता प्रीतम !




मेरा पता 

आज मैंने 
अपने घर का नंबर मिटाया है 
और गली के माथे पर लगा 
गली का नाम हटाया है 
और हर सड़क की 
दिशा का नाम पोंछ दिया है 
पर अगर आपको मुझे ज़रूर पाना है 
तो हर देश के, हर शहर की,
हर गली द्वार खटखटाओ 
यह एक शाप है, यह एक वर है 
और जहाँ भी 
आज़ाद रूह की झलक पड़े 
समझना वह मेरा घर है--


अमृता प्रीतम !


रोज़ी 

नीले आसमान के कोने में 
रात-मिल का साइरन बोलता है 
चाँद की चिमनी से 
सफ़ेद गाढ़ा धुँआ उठता है 

सपने- जैसे कई भट्टियां हैं 
हर भट्टी में आग झाँकता हुआ 
मेरा इश्क़ मजदूरी करता है 

तेरा मिलना ऐसे होता है  
जैसे कोई हथेली पर 
एक वक़्त की रोज़ी रख दे

जो खाली हंडिया भरता है 
राँध-पकाकर अन्न परसकर 
वही हाँडी उल्टा रखता है 

बची आँच पर हाथ  है 
घड़ी पहर को लेता है 
और ख़ुदा का शुक्र मानता है

रात-मिल  साइरन बोलता है 
चाँद  चिमनी में से 
धुँआ इस उम्मीद पर निकलता है 
 
जो कमाना है वही खाना है 
न कोई टुकड़ा कल का बचा है 
न कोई टुकड़ा कल के लिए है---



अमृता प्रीतम !















AMRITAPRITAM-HINDI KAVITA-KUFRA--DEODARONLINE-अमृता प्रीतम - हिंदी कविता-कुफ़्र

 कुफ़्र 


आज हमने एक दुनियाँ बेची
और एक दिन ख़रीद लिया 
हमने कुफ़्र की बात की 

सपनों  का एक थान बुना था
एक गज़ कपड़ा फाड़ लिया 
और उम्र की चोली सीली 




आज हमने आसमान के घड़े से 
बादल का एक ढकना उतारा
और एक घूंट चांदनी पी ली 

यह जो एक घड़ी हमने 
मौत से उधार ली है 
गीतों से इसका दाम चुका देंगे!









Wednesday, 27 May 2020

हिन्दी कविता - तुम्हारी मौजूदगी - Hindi Kavita - Tumhari Maujadgi - DeodarOnline

तुम्हारी मौजूदगी      


तुम्हारा होना मेरे लिये उस बसन्त की तरह है,
जिसका इंतजार मैने तब से किया
जब मैने पहला बसन्त देखा, और तुम्हें भी।
ये बसन्त बहुत इतरा रहा है,
फूलों की पंखुड़ियाँ और नाजुक हो रही हैं। 
बहार आने का ये अलग ही ढंग है।
शायद तुमसे ही सीखा है मौसम ने ये मिजाज
हर रोज पहले से ज्यादा रौनक चैहरा तुम्हारा

बसन्त

 
क्या तुम्हें पता है?
इस बार बसन्त अपना कुछ रंग तुम में छोड़ गया है।
लेकिन चुप-चाप, आहिस्ता-आहिस्ता
दबे पाँव जंगलों में, तुम्हारा जादू,
तुम्हारी चंचल हंसी की तरह, घुल रहा है।
गुम-सुम खड़ी तुम, झरने के निनाद मे,
चुपके से मेरे कानों मे वो बात बोल जाती हो
जो सिर्फ मै और शायद ये बसन्त ही जानता है
और मैं वो  खामोश पानी हूँ,
जिसमे तुम अपनी परछाई देख सकती हो।
वो विरान रात जिसे सिर्फ तुम्हारा इंतजार रहा हमेशा।  

(अमित कुमार )


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Thursday, 30 April 2020

हिंदी कविता : छुटपन - मेरा घर : Hindi kavita : Chutpan : Deodar Online

छुटपन- मेरा घर

छोटे थे सपने, छोटी थी उड़ान
छोटे थे रास्ते, छोटी थी मंजिलें
छोटे थे हम, छोटा था जहान

याद है मुझको अब भी बचपन का वो पल
खेला कूदा करते थे जहाँ हम कल
करते थे बरसाती में उछल-कूद
छोटी सी बात पर लड़ जाना
बैरिंग के पहियों की आवाज
न था सुर उसमें न थी ताल
पर सुरिले थे वो कितने
चुने हुए सरगमों की तरह
उफ! छूट गया वो सब

बर्फ में खेलना
लकड़ी की बर्फ वाली गाड़ी
पाइप से बनी जीवन चक्र की तरह,
गोल-गोल रत्ती गाड़ी।

Chutpan -Mera ghar

काॅलेज की कैंटिन से कोक, पेप्सी के ढक्कन ढूंढना
काँच की गोलियों मे सारा जीवन
दिवाली की हफ्तों पहले तैयारी
एक-एक करके जलाना मुर्गा छाप बम।

आज सब हैं वहाँ, पर हम नहीं
न सुर, न साझ, न संगीत
अब नजर आता है तो बस,
कल की सोच मे ढूबा जीवन
उलझने, परेशानियाँ, जिम्मेदारियाँ

सोचता हूँ अगला जीवन मिले तो 
फिर वहीं पैदा हूँ, हाँ वहीं
जहाँ बजता है साझ जीवन का
बैरिंग गाड़ी का, चकरी का, बचपन का,
काँचों की खनखनाहट बनाती है जहाँ जीवन।



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Friday, 7 February 2020

हिंदी कविता - हर बात - प्रेम कविता - हर बात - Hindi Kavita - Har baat - Deodar Online

हिंदी कविता - हर बात - प्रेम कविता - हर बात - Hindi Kavita - Har baat - Deodar Online

हर बात !

तुम युहीं रूठती रहो, मैं युहीं मनाता रहूं,
ज़िन्दगी युहीं हो तो क्या बात है। 

हर बात तुमसे शुरू, हर बात तुमपे ख़त्म,
हर बात युहीं हो तो क्या बात है। 

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फोटो साभार- Piqsels 
कुछ सफ़र तुम चलो, कुछ सफ़र हम चलें,
हर सफ़र युहीं हो तो क्या बात है। 

मेरी कलम ने लिख दिया, युहीं सबको,
ये बस तुझे ही लिखती जाए, तो क्या बात है। 

तेरी याद साथ हो, तेरी बात साथ हो,
मौत भी युहीं हो तो, क्या बात है। 





लेखक- तरुण 




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Wednesday, 5 February 2020

हिंदी कविता - तुम शब्दों में | Hindi Kavita - Tum Shabdon Mai | Deodar Online | Love Poems

तुम शब्दों में !

युहीं लिख दिया 
तुमको मैंने शब्दों में,
शब्द शायद अटपटा सा लगे
पर हैं भी कहाँ मेरे पास 
इसके सिवा 
तुमको देने के लिए कुछ। 

वो जो चुम्बन, मैंने लिए थे,
जिज्ञासु बच्चे की तरह। 
वो जो कुछ भी, मैंने तुम्हारे शरीर में टटोला,
मेरे पास कुछ नही है कहने लिए। 

फोटो साभार- flickr 

वो सभी जगह 
जहाँ हम थे कभी 
याद है, तुमको 
यादें होना भी बड़ी बात है , अपने आप मे 

मैंने हमेशा लिखनी चाही है 
कोई कविता तुम्हारे लिए 
पर शब्द नहीं ढूंढ पाया 
ये शब्द ही शायद कविता हैं। 

मैं लिखना चाहूँगा इनको 
हिमालय सा सफ़ेद,
जिनका जिक्र तुमने कर दिया था 
बातों-बातों में कभी। 

मैं लिखना चाहूंगा इन्हें हँसी सा,
जिसको मैं ढूंढता रहा 
तुम्हारे चेहरे में हमेशा।

मैं लिखना चाहूँगा तुम्हारी आँखों को,
जिनमे विरोध था और 
विरोध के बीच समर्पण भी। 

उस कविता मे जिक्र होगा
मेरे हौसले का,
जो मैंने किया था 
अपने हाथों को तुम्हारी तरफ खींचते हुए। 

उस कविता मे जिक्र होगा 
घुप्प उगी हुई घास का,
जिसने मिलाना चाहा था 
तुमसे मुझे। 

और इन सब को शब्दों में 
ढाल लेने के बाद,
शायद मैं पूरी कर ही लूँगा 
उस कविता को 
जिसमें जिक्र होगा तुम्हारा 
और तुममे मेरा।



लेखक-तरुण 




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